माड़साब के लिए माँ-पिताजी की पहली चिट्ठी

माड़साब के लिए माँ-पिताजी की पहली चिट्ठी माड़साब, आपको उन बच्चों के माता-पिता की तरफ से नमस्ते जो सिर्फ आपके विद्यालय के लिए ही जन्में...

माड़साब के लिए माँ-पिताजी की पहली चिट्ठी

माड़साब के लिए माँ-पिताजी की पहली चिट्ठी

माड़साब,
आपको उन बच्चों के माता-पिता की तरफ से नमस्ते जो सिर्फ आपके विद्यालय के लिए ही जन्में हैं। हम वो अभिभावक हैं जिन्हें सिर्फ ये मालुम है की उनकी संतानें वो नहीं करेगी जो वे खुद जीवनभर करते रहे। इतना समझ लें कि आगे के रास्ते ढूँढने के लिए ही बच्चे आपके आसरे हैं हमारी यह साझी चिट्ठी है जो गांवभर की तरफ से एक यथार्थ बयान समझी जाए तो बेहतर होगा। पूरे गाँव की तरफ से मैं लिख रहा हूँ। इसलिए लिख पा रहा हूँ क्योंकि हमारे वक़्त के सारे माड़साब कामचोर थे। उनके ज़माने के सारे बच्चे आज मजदूरी में खप रहे हैं। एक भी नौकरी न लग पाया। मैं एक अंधों में काणा राजा की मानिंद हूँ। हाँ याद आया वे मास्टर हमसे गाँव से खाटी छाछ और खेत से लहसून, ककड़ी, प्याज और भुट्टे मंगवाने में रह गए और हम लाचार और भोले लाने में रह गए। लेनदेन से गुस्सा नहीं हैं अफ़सोस इस बात का कि वे उसके बाद भी हमें बदले में कुछ न दे पाए। हाँ तो मैं कह रहा था कि ये स्कूल भले सरकारी है मगर इसे खाली सरकारी मत समझना और बाक़ी ज़रूरतों के लिए हमें टटोलते रहिएगा। हमें खुशी ही होगी। हम खुद वंचित और पीड़ित तबके के लोग हैं जिनकी संताने आज आपके सुपुर्द हैं। हम बहुत असभ्य लोग हैं। हमारी भीतर सभ्यता के तमाम गुण रोपने और उन्हें सींचने का सलीका अगर किसी के पास है तो वो आपके पास हैं माड़साब 

लोग कहते हैं ये स्कूली बच्चे देश का बहुत बड़ा हिस्सा है और युवा हैं मतलब देश के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी। सच बताना सर जी क्या आपको भी ऐसा ही लगता है? आशा है आप भी इन बच्चों को मीड डे खाने के लिए आने वाली पीढ़ी नहीं समझते होंगे। आस तो यह भी पाल रखी है कि बाकी समाज की तरह आपके द्वारा दलित और जातिगत शब्दों से इन्हें जलील नहीं किया जाता होगा। हमें मालुम है आप भी उसी दोगले मानसिकता वाले समाज से आते हैं जो अपनी मानसिक बीमारी के कारण दबे और लगभग वंचित तबके के बच्चों के साथ एक अलग तरह के माइंड सेट के साथ पेश आता है। मगर हम इस दौर में आपसे अच्छे की कामना करते हैं। आश्वस्त हैं कि आप अलग मिसाल कायम करेंगे। आप एक बार अपनी ताकत और जिम्मे का अहसास कर लीजिएगा, सच बता रहे हैं आपको आगे बढ़ने से ये कम-संसाधनयुक्त परिवेश रोक नहीं सकेगा। सुविधाओं के मामले में प्राइवेट और सरकारी की तुलना का रोना रोते रहेंगे तो आप भी कुछ नहीं कर पाएंगे। हम जानते हैं आप में बहुत योग्यता है मगर आप अपना समय सही जगह नहीं लगा पा रहे हैं। अभी भी गंगा में उतना पानी नहीं बहा है जितना आप समझकर हारे हुए की-सी शक्ल लिए बैठे हैं

आप खुद ही समझदार हैं। सोचिएगा तो पाएंगे कि आपको रोज़ाना मिलने वाली सेलेरी और आपके रोज़ के काम का आंकलन आपको शर्म से सिर झुकाने पर मजबूर कर देगा। हमें अभी भी देश के संविधान की गरिमा का बोध और उसे संभालने का जिम्मा आप में एक भरोसे की तरह नज़र आता है। गुरु जी क्या हम सही सोच रहे हैं? ये वो बच्चे हैं जो आपके लिए सुविधा नहीं चैलेंज है। आपके आलसी रवैया से ये बच्चे भी प्राइवेट की तरफ उड़ चले तो फिर हमें मत कहिएगा। गाँव में रैली निकालते रहिएगा फिर कोई साथ नहीं देने वाला। दीवारों पर चिपकाए प्रवेशोत्सव के पोस्टर गाएं खा जाएँगी। खम्भों पर लटकाए बेनर्स लोग काट ले जाएंगे और उन पर पापड़ सुखाएंगे। गाँव में कोई शादी-ब्याव के नुते देने नहीं आयेगा। 'सब पढ़े और सब बढ़े' के नारे हवा में हिचकोले खाते अनुभव होंगे तब मत कहिएगा। सरकार एक दिन परेशान होकर सबकुछ निजी हाथों में दे देगी। आपको सरकार के बजाय सेठ जी की नौकरी करनी होगी। सोचिएगा वो दिन कितना भयावह होगा

यह बच्चे आपके लिए प्रयोगशाला की एक सामग्री हैं। घबराएं नहीं बेहिचक प्रयोग करें और रिजल्ट दें। प्रतिभावान को पढ़ाना और मेरिट सरीखे बनाकर होर्डिंग पर उनके फोटो चिपकाने जैसे आसान काम तो प्राइवेट स्कूलों के मास्टरों के जिम्मे हैं। हम कुछ ही कक्षा पढ़े हैं मगर इतना तो जानते ही हैं कि आपका काम समाज की गैर-बराबरी को दूर करना है। अपनी अहम् जिम्मेदारी से भागिएगा नहीं प्लीज, नहीं तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। हिंदी के कवि चंद्रकांत देवताले जी की कविता आपने सुनी और पढ़ी होगी 'कुछ बच्चे और बाक़ी बच्चे'। आपके आसपास जो हैं ये बाक़ी के बच्चे हैं जो असल में बचे हुए की जमात हैं। इन्हें इस मुश्किल समय में हर धर्म और वर्ग को समानता की नज़र से देखते, समझते हुए हमारी सामासिक संस्कृति की समझ देना आपकी जिम्मेदारी है। आशा है आप अपने खुद के धर्म के अलावा भी ज्ञान रखते हुए पूरी सद्भावना के साथ इन बच्चों को हिन्दुस्तान की एक पूरी पिक्चर दिखाएंगे। बच्चे दिवाली के साथ ईद और क्रिसमस भी समझा सके ये आपका काम है। गुड फ्राइडे के साथ गुरु नानक जयंती को थाह सके ये भी आपके काम की फेहरिश्त का हिस्सा है। जनवरी-फरवरी की अंग्रेज़ी संस्कृति के साथ अमावस-पूनम का लोक भी बच्चे समझना चाहते हैं मगर वे आपकी तरफ देख रहे हैं। आप उन्हें अपने बच्चों की तरह समझाएंगे ना? बच्चे 'ईदगाह' और 'गौरा' जैसे पाठ पढ़ते समय आपके समग्र ज्ञान और अनुभव की बाट जोहते हैं। उन्हें इस महादेश में विद्यमान विभिन्न देशों की भिन्न-भिन्न संस्कृतियों की विविधता का गहराई से स्वाद देना आपका सबसे बड़ा जिम्मा है। बस इतना भर कर दीजिएगा बाकी राह ये खुद ढूंढ लेंगे

शायद आप इन बचे हुए बच्चों के बेकग्राउंड के बारे में परिचित होंगे वो यह कि इनके घरों में अमूमन माँ-पिताजी अनपढ़ हैं, किसान हैं, नरेगा मजदूर हैं, कोई किराना व्यापारी है और कोई साइकिल का पंचर बनाते हैं, कुल्फियां बेचते हैं, मकान बनाते कारीगर हैं, कोई ट्रेक्टर चलाता है तो कोई चुनाई करता है। कोई मंदिर के बाहर फूल-माला बेचकर ज़िन्दगी ठेल रहा है तो कोई कुरते-पायजामे सिलकर जी रहा है बस। किसी की माँ नहीं है तो किसी के पिताजी बचपन में गुँजर गए। किसी का भाई पागल है। किसी का मामा या नाना शराब पीकर घर में उत्पात मचाता है। कोई बकरियां चराता और पेट पालता है। किसी के अभिभावक एकदम बूढा गए हैं। किसी के पास वक़्त बहुत कम है। कोई पहले से बाल विवाह का शिकार हो चुका है। कोई आपके तम्बाकू निषेध वाले पोस्टर पढने से पहले से ही तम्बाकू सेवन करता है। स्थितियां बड़ी भयावह है गुरूजी वे पहले से ही अपने संघर्षमयी जीवन में भरसक परेशान हैं और अब आपकी संगत में एक आस लिए आराम की तलाश में आए हैं। उन्हें इस कोहरे से बाहर निकलाना है। आप अब तो समझ ही गए होंगे आपके पास कितना बड़ा काम है। बनिए की तरह हर काम को सेलेरी या बोनस से मत तोलिएगा। यह राष्ट्र धर्म है जो आपको बुला रहा है। इधर, इधर यहाँ से जहां मासूम बच्चे देर से आपको ताक रहे हैं और आप हैं कि सातवे वेतन आयोग के जोड़-घटाव में आधा कालांश स्वा-हा कर चुके हैं। मैं सबकुछ दिल से लिख रहा हूँ। दिमाग से कहता तो शुरू में ही लिखा देता कि आपकी सेलेरी का पैसा मेरे टेक्स देने से आता है। सभी के गिर जाने के समय में हम किसान-मजदूर अभी बचे हुए हैं और आपसे उम्मीद है कि आप भी अपने पद की गरिमा से और निचे नहीं गिरेंगे। सरकार मेरे कर से चलती है। मगर मैं जानता हूँ यह मेरी पहली चिट्ठी है। शुरुआत में ही इतना तल्ख़ होना अभी से अच्छा नहीं। हालांकि बहुत सा तीखा लिखा है मगर क्या करें। मेरे पास दो ही रास्ते थे या तो मैं दिल बहलाने वाली 'गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु' टाइप चिट्ठी लिख देता या फिर सच को सच की तरह कहती एक आग उगलती चिठ्ठी

हाँ तो ये वो बच्चे हैं जो खेत पर जाने से बच गए। जिनके घरों में पढ़ने के लिए अलग से कमरा तो दूर एक टेबल तक नहीं है। लाइट कभी कभार आती है। बच्चियां एक समय का चुल्हा चौका करती है। पानी भरती है और बर्तन मांजती है। दस-दस मिल से दूर से केसरिया साइकिल चलाकर आती हैं बच्चियां। उनकी आँखों में आस है। बस्ते में कोपियाँ हैं, किताबें हैं, पेन्सिल, रबर, पेन सबकुछ हैं। बारीश में रास्ते में दो से तीन नाले पड़ते हैं। पूरा जोखिम मोल लेती है साहेब। बड़ी जुगत से स्कूल आती है उस पर आप उन्हें बिना पढ़ाए घर भेज देते हैं। क्या यह झूठ है? सच बताइएगा। काश यह झूठ साबित हो जाए कई मर्तबा आप उन्हें झिड़क देते हैं, आपसी और इधर-उधर की गपशप पर टाइम पास करके चले जाते हैं। कक्षा में टेबल पर टांग रखकर अखबारी पन्ने पलटने में वक़्त बिता देते हैं। मैं आज तक नहीं समझ पाया। पीरियड का घंटा बच्चे तो सुनते हैं मगर आप क्यों नहीं? वक़्त बीत रहा है गुरु जी आपको भी कहीं तो जवाब देना ही होगा

ये वो बच्चे हैं जिन्हें पता नहीं कि टिफिन बॉक्स कैसे बंद होता और खुलता है। नेलकटर किस चिड़ियाँ का नाम है उनकी समझ के बाहर का विषय है। कंप्यूटर को बहुत दूर से देखा है साहेब। उनकी आँखों में कभी आराम से देखिएगा वे आपसे बहुत कुछ चाहते हैं। वक़्त निकालेंगे ना गुरूजी ? हाँ याद आया यही वो पीढ़ी है जिनके टीकाकरण का कार्ड कहीं घूम गया है। ये ही वो बच्चे हैं जो शादी के ब्याह के जीमने में स्कूल की ड्रेस भी बड़े शान और भोलेपन में पहनकर चले ही जाते हैं। ये वो बच्चे भी हैं जिन्हें जातिगत आधार पर मिलने वाली स्कोलरशिप के नाम पर कभी कभार आप अजाने में ही सार्वजनिक रूप से शर्मशार कर देते हो। ये बच्चे होमवर्क करते हुए ज्यूस नहीं पीते जनाब। इनके माँ रात में इनके दिमाग की तेज़ी के लिए दस बादाम नहीं गलाती। पेरेंट्स मीटिंग के लिए इनके माँ-पिताजी के पास वक़्त होता तो ये आपकी शागिर्दी में न होते। असल में ये बच्चे आपके ही भरोसे हैं। अगर आप इन्हें धर्म, वर्ग और जाति की संकीर्णता से बाहर आकर देखोगे तो सही से समझ पाओगे। बड़ा अफ़सोस है कि विद्या के मंदिरों में भी बच्चे अध्यापकों की तरफ से इन संकीर्णताओं के शिकार हैं। मैं आपके जवाबी चिठ्ठी का इंतज़ार करूंगा। आप मेरी धारणाएं तोड़ सके तो आपसे ज्यादा खुशी मुझे होगी। आखिर में कुछ और कहना है कि इन बच्चों की तुलना किसी से मत करिएगा क्योंकि ये अपनी तरह के बिरले बच्चे हैं। इनका देश, काल और समय एकदम अलग हैं। इसे सरल भाषा में यूं समझिएगा कि आंकड़ों की बदौलत विकसित होते इंडिया में ये एक अलग भारत है। इनके हालात अलग हैं। इन्हें आगे ले जाने आपका दायित्व भी है और आपके लिए अहम् चैलेंज भी। आशा है आप इस चैलेंज को स्वीकार करोगे। जल्दी ही मैं आपको अगली चिट्ठी लिखूंगा और स्कूल मिलने भी आउंगा। जिम्मेदारियों से हम भाग भी नहीं रहे हैं। हम साथ ही खड़े हैं। लीडर आपको बनाना पडेगा। हम असल में कम अक्ल इंसान हैं। कम लिखा है ज्यादा समझना। मैं आपके 'माड़साब' से 'गुरु' हो जाने की कामना करता हूँ

बसेड़ा के बच्चों में से किसी एक का पिता
(बसेड़ा की डायरी, 20 जुलाई 2017)

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