माड़साब के लिए माँ-पिताजी की पहली चिट्ठी

माड़साब के लिए माँ-पिताजी की पहली चिट्ठी माड़साब, आपको उन बच्चों के माता-पिता की तरफ से नमस्ते जो सिर्फ आपके विद्यालय के लिए ही जन्में...

स्कूल से दोस्ती

नमस्कार,आपकी शुभकामनाओं और सहयोग से मेरा स्कूल व्याख्याता (हिंदी)पद पर राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय बसेड़ा,तहसील छोटीसादड़ी,ज़िला प्रतापगढ़ पर पोस्टिंग हुआ है जो चित्तौड़गढ़ से प्रतापगढ़ हाई वे पर बाड़ी गांव से ठीक बाद है इस तरह चित्तौड़ से कुल 45 किलोमीटर दूर स्थित है।इस बाबत जब भी स्नेहभोज का आयोजन होगा आपको याद करेंगे।अनुग्रह बनाए रखिएगा।आदर सहित माणिक,चित्तौड़गढ़।

दस मिनट की अनौपचारिक विदाई में कुल जमा पच्चीस बच्चों के बीच तीन वाक्य भी नहीं बोल पाया कि रो पड़ा.अब औपचारिक विदाई का सामना मैं नहीं कर सकूंगा.प्लीज मेरा लिखा हुआ भाषण पढ़ा जाए तो बेहतर है.विदाई में पहनाई माला घर ले आया.वहां के साथियों की तरह फूल बड़े खुशबूदार थे

रोज़ाना पचास किलोमीटर जाना और फिर आना,इसके बाद एक आदमी के भीतर का 'एक्टिविस्ट' दम तोड़ने लगता है.(आतमज्ञान)

एक साथ खुद के सिंगल-सिंगल चारेक दर्ज़न फोटो खिंचवाना और आधा दर्ज़न माला पहनना खुद को असहज करने का सबसे आसान तरीका है.(आतमज्ञान)

अनुष्का आज मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' का विडियो रूपांतरण देख रही है।कल उसने चिल्ड्रन फ़िल्म सोसायटी ऑफ इंडिया की फ़िल्म 'सुल्तान की कुकडू कू' देखी(अनौपचारिक शिक्षा जारी आहे) बाकी टीवी तो बंद है यह ख़बर अब पुरानी हो गयी है।

कक्षा 11 और 12 के कुल जमा एक दर्जन विद्यार्थी।अनौपचारिक बातचीत।चित्रा मुद्गल जी की कहानी 'जगदम्बा बाबू गांव आ रहे हैं' का पाठ किया।अद्भुत कहन।देसज अंदाज।लोक की खुशबू।राजनीति का दोहरा चरित्र।ममतामयी सुख्खन भौजी।सरकारी तंत्र की पोल पट्टी।पहले ही दिन वो किया जो सिलेबस में नहीं है।पासबुकों और पुस्तकों की रेस में पासबुकें फिर जीत गयीं.पुस्तकें अभी तक आयी नहीं मगर पासबुकें मंझिल तक पहुँच गयी हैं.पुस्तकें आजकल बेवफा होने लगी है.(आप बाज़ार के अधबीच हैं)(बसेड़ा की डायरी-0)

सूचनार्थ:सवेरे आठ से दोपहर दो बजे तक मैं स्कूल में रहता हूँ.यथासंभव मुझे इस दौरान फ़ोन नहीं करेंगे तो मैं और मेरे विद्यार्थी आपके आभारी रहेंगे.बाकी अतिआवश्यक परिस्थितियों में कॉल कर लीजिएगा.वैसे जानकारी के लिए बता दूं स्कूल परिसर में मेरे फोन पर किसी भी तरह के नेटवर्क और इन्टरनेट सुविधा उपलब्ध नहीं रहती है.........आज अपने स्टाफ साथियों के साथ लम्बी बैठक हुई. योजनाएं कोंपलों की तरह फूटने लगी है.जल्दी ही रिजल्ट आएँगे तो आपके साथ फोटो आदि शेयर करूंगा ही.शुक्रिया

आगे बढ़ने के तीन नारे जो आज मैं विद्यार्थियों को सौंपने जा रहा हूँ।इनमें नारा लगाने वाली लय मत ढूंढिएगा।ये एक वंचित क्षेत्र को मुख्यधारा में लाने की अलख है। 1-मेरा स्कूल मेरा घर है। 2-हमारा स्कूल सबसे आगे। 3-सबसे अच्छा स्कूल हमारा।

सूचनार्थ:सत्रह में से सात पद खाली है.प्रिंसिपल नहीं है.बाबू नहीं है.चपरासी तो है ही नहीं. तीनों भाषाओं के तीन सेकण्ड ग्रेड अध्यापक के पद खाली है.एक लेवल टू अध्यापक का पद भी खाली है.मतलब आप समझ रहे हैं कि एक आदमी दो काम कैसे कर रहा होगा.जो व्याख्याता भरेपूरे स्टाफ के साथ अध्यापनरत हैं उन्हें यहाँ हम वंचित क्षेत्र के और कम मानव संसाधन वालों के कठिन समय में हम व्याख्याताओं पर टिप्पणी करने की ज़रूरत नहीं हैं.हम खाली का रोना रोने के बजाय मिले हुए संसाधनों के बीच बेहतर करने के पक्ष में हैं.राजस्थान सरकार अपने स्तर पर सतत प्रयास कर ही रही है कि डीपीसी लगातार हो और बाकी खाली पद भी भरे जा सके. पद भी जल्दी ही भरेंगे मगर फिलहाल का सच यही है कि पद खाली हैं.हम एक ऐसे इलाके में अध्यापन का काम देख रहे हैं जहां लोग देश के लोकप्रिय प्रधान मंत्री जी तक का नाम नहीं जानते हैं.आप समझ सकते हैं कितना मुश्किल काम है. इसी से अंदाजा लगा लीजिएगा कि जनरल नॉलेज पर कितना काम करने की ज़रूरत है.

हमारा स्कूल हमारा घर है।इसकी सारी जिम्मेदारी हमारी है।हम किसी के भरोसे नहीं हैं।कुछ मिला तो वो हमारे लिए बोनस या ईनाम माना जाए।हम अपने माता पिता सहित हमारे सरकारी स्कूल की कायाकल्प करना चाहतीं हैं।हमें बताया भी गया और अब हम समझ गए हैं कि किताबी ज्ञान के अलावा भी टीम भावना और सामाजिकता जैसे कई पाठ हमें हमारा स्कूल परिवेश ही सिखाता है।

योग भगाए रोग।शारीरिक शिक्षक श्री नंदकिशोर दुबे जी के निर्देशन में प्रार्थना में रोज़ाना की ज़रूरी गतिविधि प्राणायाम और ध्यान।मैंने इसमें तानपुरे की धुन जोड़ दी है।अभी मोबाइल से चलाता हूँ।कुछ दिन में एक साउंड सिस्टम प्लान करेंगे।मैं स्कूल में बीते एक साल से एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूँ जिसका नाम है 'म्यूजिक इन द स्कूल'। जल्दी ही पूरी जानकारी साझा करूँगा।

इन दिनों की दिनचर्या से एकदम संकड़ाई में आ गया हूँ।वक़्त लगभग नहीं मिलता है।बीते सालों की फ़ुरसत बहुत याद आती है।कई नए कार्यालयी काम सिख रहा हूँ।सेकंडरी स्कूल दुर्ग का एक साल का अनुभव बड़ा काम आ रहा है।आजकल सवेरे पाँच बजे का उठा छह से आठ बजे तक रोडवेज का सफर तय करके बसेड़ा स्कूल पहुँचता हूँ।स्कूल जाने के बाद हिंदी और 'हिंदी की बिंदी' में कब दो बज जाते हैं मुझे पता नहीं चलता है।खैर मैं यह साझा करना चाहता हूँ कि सवेरे यात्रा के दौरान एक घण्टा शास्त्रीय संगीत सुनकर सार्थक करता हूँ।बाकी के साठ मिनट किताब पढ़ने में।आजकल 'कँवल भारती जी' को पढ़ रहा हूँ।क्या गज़ब की व्याख्या के साथ इस पुस्तक :दलित विमर्श की भूमिका' को रचा है।स्कूल में आदत के मुताबिक पाठ्यक्रम के साथ साथ गैर अकादमिक शिक्षा यानी 'जीवन का गणित' पढ़ा रहा हूँ।आते वक्त इतना थक जाता हूँ कि पूरे सफर बस में सोने की इच्छा रहती है।

सरकारी स्कूल अक्सर एक सरीखी खुशबू वाले होते हैं मगर उन्हें सतरंगा अगर कोई बनाता है तो वहां का स्टाफ।बेहतरी की गुंजाईश हमेशा बालमना विद्यार्थियों में ही बची रहती है।साथी और बुजुर्ग-मन वाले जड़ अध्यापकों में सुधार और ओरियंटेशन की संभावना एकदम ज़ीरो मानकर चलें।देहात के बच्चों के बीच काम करना ज्यादा सुविधाजनक और परिणामदायक अनुभव हुआ।अध्यापकी के बीते सत्रह साल के जीवन में मैंने पंद्रह साल सरकारी स्कूलों में अध्यापन (मेरे अनुसार अध्यापन का अर्थ नौकरी नहीं है।)करते हुए दर्जनों प्रयोग किए।आज भी जारी है।मैं कई मोर्चों पर सक्रिय रहा हूँ और उन सभी संगतों का निचोड़ अब स्कूली शिक्षा और इन विद्यार्थियों के बीच सार्थक करना चाहता हूँ।सिलेबस से बाहर जाने की मेरी आदत बदस्तूर जारी है।वैसे भी गाँव के स्कूल के बच्चे इस दुनियादारी के गणित को समझने में बहुत ज़्यादा पीछे हैं तो हमारी जिम्मेदारी अपने आप कुछ अतिरिक्त हो जाती है।मेरे अतीत का बहुतेरा हिस्सा गाँव ने ही घेर रखा है।सैंतीस की उम्र में बीस साल पर गाँव और बाकी पर शहरी आबोहवा का कब्जा है।फिर भी बताता चलूं कि कुलजमा मैं शहर की पकड़ और जकड़ से दूर रहना चाहता हूँ।वक़्त कम है काम ज़्यादा।एकाग्रता बलिदान मांगती है।कुछ गंभीर और गहरा काम करने के लिए अब आकाशवाणी,स्पिक मैके,आरोहण,फ़िल्म सोसायटी,आर्ट सोसायटी में उतना समय और विचार नहीं दे पाता।बसेड़ा स्कूल के बच्चे और गांव के अभिभावक धीरे धीरे मेरे दिल के पास आ रहे हैं।


7 जुलाई 2017

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