'टेंशन फ्री सेटरडे इन बसेड़ा'

'टेंशन फ्री सेटरडे इन बसेड़ा' साल दो हज़ार से अध्यापक हूँ और लगातार नित नए प्रयोग का आदि हूँ। तेईस जून 2017 से अब तक में...

माफ़ीनामा

माफीनामा
नमस्ते,माफ़ करना विद्यार्थियो।हम गुरु नहीं सिर्फ मास्टर हैं।गुरु हो जाना बहुत बड़ा मसला है अभी तो हम अध्यापक होने के कगार पर हैं।जब तक हम समय,समाज और देशकाल की ज़रूरत के मुताबिक़ आज की युवतर पीढ़ी को ठीक से समझकर भविष्य की खातिर उसे तैयार नहीं करते तब तक मास्टर ही रहेंगे। गुरु नहीं बन पाएंगे।हमें मालुम है कि आप हमारी सच्चाइयां जानते हो।बस बोलते नहीं हो,यह आप लोगों की भलमनसाहत है।एक आहट हम समझ चुके हैं कि हमें अब सेलेरी केद्रित जीवन के खांचे से बाहर आना होगा।अब भी जान लें तो बेहतर ही होगा कि बोनस केन्द्रित विमर्श से बाहर भी जीवन है।वेतन आयोग के गणित के अलावा भी हमारी भागीदारी है जो समाज को बनाती और बिगाड़ती है।केवल अखबार पढ़कर अध्यापकी का 'धंधा' चला लेने वाले समझ लें क्योंकि अब समय वैसा नहीं रहा।कमज़ोर से कमज़ोर बच्चा भी थाह लेता है कि आज माड़साब बिना तैयारी के कक्षा में घूस गए।प्लाट/बिल्डिंग बेचने और शेयर मार्केट में व्यस्त रहने की तरह अध्ययन-अध्यापन धंधा नहीं है।

सबसे बड़ी बात 'अध्यापक' होना पार्ट टाइम नौकरी तो कम से कम नहीं ही है।अफ़सोस इन सालों में विद्यार्थियों से ज्यादा माड़साब को 'संजीव' और 'एक्सीलेंट' की ज़रूरत पड़ने लगी है।बेचारे टीचर्स का क्या होता? अगर संजीव भाई और एक्सीलेंट बाबा नहीं होते।पाठ्यक्रम में लगी पुस्तकों के अलावा सन्दर्भ किताबें पढ़ना तो दूर उनके टाइटल तक याद नहीं है।सिलेबस के अलावा किताबें कब पढ़ी ठीक याद नहीं है।बुजुर्ग होने के साथ ही अब सबकुछ बूढा गया है।माफ़ करना बच्चों हम आपकी ज़रूरत के मुताबिक़ अपडेट नहीं हैं।हमें मालुम है कि हम वक़्त के साथ वेतन और उम्र में सीनियर होते जाते हैं अनुभव में भी मगर जानकारियों के लिहाज से खाली और उथले।कभी माफ़ कर सकोगे क्या कि हमने आपके लिए सीमाओं से बाहर जाकर कोई गतिविधि प्लान ही नहीं की।हम सिर्फ आए हुए सरकारी आदेशों को निबटाने में ही ख़त्म होते रहे।हमें मालुम है कि रिटायरमेंट के बाद तुम हमें नमस्ते नहीं करोगे क्योंकि हमें अपने काम की उष्मा का स्तर मालुम है।

यह सभी गैर जिम्मेदार अध्यापकों की तरफ से आपको लिखा जा रहा एक माफीनामा है जिसे लिखने में मैं सबसे आगे हूँ।अगर माफ़ कर सको तो देख लेना कि मैं आपको पढ़ाया जाने वाला पाठ सीधे कक्षा में आने के बाद ही देख पाता रहा हूँ।पाठ के रेफरेंस में बनी फिल्म,किसी पुस्तक में आयी समीक्षा,पत्रिका में आया साक्षात्कार,कवि और लेखक से सजीव सम्पर्क की यादें जैसा कुछ भी खंगाल नहीं पाता मैं। मुझे नहीं मालुम मैंने आखिरी बार न्यूज पेपर के अलावा कौनसी साहित्यिक पत्रिका कब खरीदी और पढ़ी थी? ये भी याद नहीं रहा कि कब किसी साहित्यिक सेमीनार में गया और किसी जानकार से संवाद स्थापित किया।बच्चों मुझे माफ़ करना कि मेरे लिए स्कूल आना और जाना सिर्फ वेतन प्राप्ति का साधन मात्र है।माफी इस बात की भी कि मैंने कभी ये नहीं पता लगाया कि कौनसे बच्चे के माँ बाप कौन हैं? और उनके परिवार की मौजूदा स्थितियां कैसी है जो इसकी पढ़ाई को इफेक्ट करती है? मेरे पास डेली-अप-डाउन के चक्कर में इतना वक़्त नहीं है कि मैं गाँव में जाकर अभिभावकों से चर्चा कर सकूं।

भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा का स्थान एक बड़े गंभीर अवसर के रूप में स्थापित है मगर क्या करें इन दशकों में ऐसे गुरु अब लुप्त:प्राय प्रजाति घोषित हो चुके हैं।ये वक़्त बड़ा कातिल है।समय आ गया है जब हम अध्यापकों को जो खासकर सरकारी संस्थानों में 'सेलेरी केन्द्रित' और 'वेतन आयोग केन्द्रित' समय बीता रहे हैं को अपने पड़त हो चुके चोलेे को उतार कुछ नया रचना होगा।हम नागनाथों के लिए ये केंचुली उतारने का समय है।मिलते हैं अगली गुरु पूर्णिमा पर। हो सकता है तब तक हम गुरु बन सकेंं।फिलहाल मैं अध्यापक हूँ।गुरु बन सका तो खुद ही दूसरा खत लिखूंगा।इसे अपने संवाद का पहला ख़त समझना।


(बसेड़ा की डायरी-9 जुलाई,2017)

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