बसेड़ा में 'हिंदी क्लब'

बसेड़ा में 'हिंदी क्लब'
नए नवेले स्कूल को सूंघने के बाद पता चला पुस्तकालय में नि:शुल्क पाठ्यपुस्तकों के अलावा पुस्तकालय के नाम पर लगभग खालीपन है। मैं एकदम अवाक और सन्न। यहीं से एक पुराना आइडिया फिर से हिलोरने लगा। उत्तर मेट्रिक तक का संस्थान और लकवाग्रस्त पुस्तकालय। काम की गुंजाईश निकल पड़ी। 'सिलेबस के अलावा सन्दर्भ पुस्तकों और गैर अकादमिक रोचक साहित्य की ज़रूरत ही विद्यार्थियों को बेहतर इंसान में तब्दील कर सकती है' यह विचार कुछ साल पहले अपने वरिष्ठ साथियों की बदौलत ठीक से समझ आ गया था। पिछले साल की अध्यापकी के अनुभव में दुर्ग चित्तौड़गढ़ स्कूल में एक योजना अपनाई और इत्तफाकन बड़ी सफल हुई। आज की डायरी के बहाने बता दूं कि किले के निवासी कक्षा नौ के साथी धीरज सालवी ने किले के बच्चों हेतु एक नि:शुल्क ग्रीष्मकालीन पुस्तकालय संचालित किया और बाईस प्रतिनिधि कहानी संग्रह में से कइयों को भरपूर पढ़वाया भी। इसी सन्डे के अवकाश में पुस्तकों की वापसी पर जब धीरज के घर गया तो पाया कि धीरज और उसके अभिभावक ने बड़े प्रेम से शाम की चाय पिलाई और देर तक इस नवाचारी काम के बारे में बतियाते रहे। धीरज ने मुंशी प्रेमचंद को जी भरकर पढ़ा,साक्षी ने मन्नू भंडारी को तो रीना ने मृद्ला गर्ग को। कोई ऋषिकेश सुलभ को तो कोई राजेंद्र यादव को पढ़कर बहुत खुश था। कई ने एकाध कहानी के बाद किताबें लौटाईं भी मगर हम इस तरह के उदाहरण के लिए तो हम पहले से तैयार थे ही।लाभ लेने वाले बच्चों की एक लम्बी सूची है जो मेरी सेलेरी प्रधान नौकरी का हिस्सा नहीं थी बल्कि मेरे फितुरमंद होने का फल था।
बीच में एक मुलाक़ात के दौरान अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के साथी और हिंदी प्रशिक्षक रमेश शर्मा जी ने भी इसी तरह का एक वाकया सुनाया। रमेश जी ने तेल के कुछ खाली डिब्बा ले ढक्कन लगाकर कनस्तर बना लिए। फिर कुछ चयनित बीसेक पत्र-पत्रिकाएँ ली और गाँव के एक सक्रीय बच्चे को दे आए, कहा अगले पखवाड़े आउंगा तब तक आपस में बांटकर पढ़ो। इसी तरह अपनी घुमक्कड़ी में एक दूजा कनस्तर किसी तीजे गाँव में दे आए। शहर से हमेशा मासिक पत्रिकाएँ ले आते और इस तरह बाल पत्रिकाओं का भी एक अच्छा कलेक्शन कर लिया। रमेश जी बड़े सहज और गंभीरता के साथ एक्टिविस्ट की भूमिका अदा करने वाले साथी हैं। वे इस आयाम को सफल करने में लगे रहे। परिणाम भी सुखद ही रहे। वे पंद्रह दिन बाद जाते एक गाँव के डिब्बे में दूजी बीस किताबें रख पुराणी किताबें बदलकर किसी तीजे या चौथे गाँव वाले कनस्तर में छोड़ आते। चलते फिरते पुस्तकालय के ये संस्करण मुझे बड़े रुचे। गाँव के बच्चे पखवाड़ा ख़त्म होते ही रमेश जी और नयी किताबों का इंतज़ार करते। रमेश जी बताते हैं कि यह उनके जीवन का बड़ा ही रोमांचकारी अनुभव था। अब शायद वे बच्चे बड़े हो गए होंगे मगर वे यह कभी नहीं कहेंगे कि हमने अपने बचपन में पत्र-पत्रिकाएँ और गैर सिलेबस प्रधान पुस्तकें नहीं पढ़ी।
ऐसे प्रयोग कोई हम ही कर रहे हों ऐसा नहीं है देश में ऐसा कई जगह हो रहा होगा। ऐसा करके हमने कोई कीर्तिमान रच लिया होगा ऐसी किसी भी गलतफहमी से हम कोसों दूर के आदमी है। हमें अपनी ज़मीन और आकाश की ऊंचाई हमेशा मालुम रहती है तो गिरने का डर नहीं सताता। खैर काम होना चाहिए क्योंकि बालपन से ही पाठकीयता को लेकर गंभीर प्रयास करने की आज बेहद ज़रूरत भी है। हाँ तो बसेड़ा में आज हमने अनौपचारिक रूप से 'हिंदी क्लब' बनाया और उसमें सबसे पहले कक्षा ग्यारह और बारह के बच्चों को कहानियों की पुस्तकें पढने के लिए प्लान की। एक युवा चेनराम को पुस्तकें थमाई और जिम्मा भी सौंपा।कक्षा में एकदम वंचित और उपेक्षित चेनराम के लिए यह अवसर उसमें जान फूँक गया। चेनराम ने जीवन में कभी सोचा नहीं था कि ऐसा अकादमिक काम भी उसे सम्भलाया जा सकता है। वो,मैं और बच्चे नयी पुस्तकों के पन्ने पलटने में मशगूल हो गए। सभी पच्चीस विद्यार्थियों को आज गुरु पूर्णिमा के भाषण की घुटकी के साथ ही एक-एक संग्रह थमा दिए। एक सप्ताह एक संग्रह के लिए तय किया गया। अगले सोमवार 'हिंदी क्लब' की अगली संगत होगी। पुस्तक लेनदेन, हिसाब वगैरह सब चेनराम देखेगा। सावन के सोमवार का ऐसा हिन्दीकरण विद्यार्थियों ने पहली मर्तबा देखा था। देहात के ये बच्चे ऐसी अनौखी पुस्तकें आँखें फाड़ फाड़कर देख और समझ रहे थे। मेरे लिए यह किसी ज्ञानपीठ की-सी खुशी से कम नहीं था।जल्दी ही मैं यहाँ के पुस्तकालय के लिए आप सभी पाठकों से किताबें उपहार में मांगूंगा। कहीं जाइएगा नहीं। कामना है कि सभी पिछड़े इलाके के बच्चों तक 'हिंदी क्लब' की ये अवधारणा कमोबेश फेरबदल के साथ पहुंचे,भले ही माध्यम कोई भी हमविचार साथी हों।नमस्कार,आप में से कोई साथी कक्षा एक से बारहवीं तक के बच्चों हेतु बाल पत्रिकाओं के सालभर पुराने अंक या पढ़ी हुई पुस्तकें या फिर नयी पुस्तकें और नए अंक भेजना चाहें उनका स्वागत है.किताबें इस पते पर भेजें......हम उन्हें बसेड़ा के बच्चों तक वितरित करेंगे.माणिक ,ए -10,कुम्भा नगर, स्कीम नम्बर-6,चित्तौड़गढ़-312001,राजस्थान.


(बसेड़ा की डायरी, 10 जुलाई 2017)

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