बसेड़ा में 'म्यूजिक इन द स्कूल'

बसेड़ा की डायरी(7)बसेड़ा में 'म्यूजिक इन द स्कूल' 

बसेड़ा के बच्चे और हिंदी वाले माड़साब के बीच अब रिश्ता गहराता जा रहा है ये संकेत एक बेहतर समाज और बेहतर विद्यार्थी जीवन की तरफ जाते रास्ते के संकेत हैं आपसी बातों से पता चला कि माड़साब शिक्षा के हलके में निन्यानवे के साल से ही हैं तीन साल प्राईवेट स्कूल का अनुभव फिर पांच साल की पैराटीचरी, आठ साल तक की ठेठ ग्रामीण इलाके की प्राइमरी स्कूल वाली अध्यापकी के साथ ही एक साल के शहरी क्षेत्र के सेकंडरी लेवल स्कूल का अनुभव लिए हुए हैं इतने बरसों में किए कई प्रयोग अब पायलट प्रोजेक्ट के घोंसले से से आगे निकल चुके हैं 'म्यूजिक इन द स्कूल' एक बरस से चला आ रहा नवाचार है  राजकीय माध्यमिक विद्यालय दुर्ग चित्तौड़गढ़ में अपने साथियों के साथ शुरू किया और अब बसेड़ा में ठीक से आकार ले पाया हैइस नवाचार में माड़साब के हडमाला(ठीकरिया) की सैकड़ों यादें शामिल है इस नए झमेले में स्कूल को एक लय में लाने के लिए दिन की शुरुआत ही म्यूजिकल होती है आठ के स्कूल में सवेरे साढ़े सात से ही परिसर में कई प्रार्थनाएं, और देश गान गूंजने लगते हैं  जो अव्वल पहूंचता है वही प्ले कर डेटा है। बसेड़ा के साथी माड़साब इसकी अनौपचारिक शुरुआत से असहज हुए मगर अब मामला सेट हो गया है और सभी महीनेभर में अभ्यस्त भी हो चले हैं 

खैर, सातवीं का पंकज इसका पहला वोलंटियर है जो सुबह सवेरे साउंड सिस्टम में अलग-अलग प्रार्थनाएं प्ले करता है  देखते ही देखते बच्चे कई रचनाएं गुनगुनाने लगे हैं चलते हुए गीत की आगे की पंक्ति खुद ही उगेरने लगे तो लगा रंग असर कर रहा है यह आनंद और इसकी कल्पना इस नवाचार का हिस्सा थी भीरचनाओं का चयन करते समय साथी अध्यापिका नीलम मेहता और ज्योति सुराणा दीदी से कई सलाह मशविरे लिए गए हिंदी वाले माड़साब बताते हैं कि इस नवाचार में उनके स्पिक मैके नाम के सांस्कृतिक आन्दोलन के साल दो हज़ार दो से आज तक के सैंकड़ों लाइव कंसर्ट और दर्ज़नभर राष्ट्रीय सेमिनारों में प्रतिभागिता के अनुभव से उपजी समझ शामिल समझी जाए। ध्यान और योग के कई सत्र की संगत के बाद यह मोड्यूल उपजा है अब बसेड़ा में दसेक प्रार्थनाएं गाई और सुनी जा रही है परिणाम आने में वक़्त लगेगा मगर सफ़र बहुत सुरीला है इतना समझ लीजिएगा अब बच्चे खाली वक़्त में जो गाते हैं उनमें अक्सर सवेरे वाली रचनाओं के पाठ मिल जाते हैं। इन प्रयोगों के बीच जीतेन्द्र यादव और आदित्य देव उर्फ़ जॉय सरीखे मित्रों के कहे पर हिंदी वाले माड़साब ने गिजू भाई की 'दिवास्वप्न' और तोतो चान की एकाध किताबें भी पढ़ी। इन दोनों किताबों का असर भी जारी है 

नवाचार का दूसरा हिस्सा इस तरह है कि बच्चे देश गान और जनपक्षधर गीतों से एकमेक हो रहे हैं बल्ली सिंह चीमा, दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, विनय और चारू, सफदर हाशमी, पीयूष मिश्रा, कवि प्रदीप जैसे ज़रूरी कवियों के लेखन को संगीतबद्ध रूप में सुन रहे हैं। कभी वे 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' सुनते हैं तो बड़े अचरज से पेश आते हैं इसी तरह कभी 'कोमल है कमज़ोर नहीं शक्ति का नाम ही नारी है'  सिलसिला चल पड़ा है तो बच्चों को एक दिन बहा ही ले जाएगा, ऐसी मान्यता लेकर ही चले हैं बसेड़ा वाले हिंदी के माड़साब देश गान की ये लिस्ट वन्दे मातरम्, जन गण मन से होती हुई  'चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के' तक जाती है तीसरी के बच्चे अब 'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा' राग में गाते हैं तो माड़साब का दिल खुश होता है। तसल्ली इस बात की है कि अब छठी के बच्चे हमारा राष्ट्र गान एक अनुशासन के साथ बावन सेकण्ड में गा लेते हैं बच्चों को अब संगीत स्कूल तक खींच लाता है बच्चे अब स्कूल आते हैं तो खिले हुए चेहरों सहित आते हैं। सवेरे का आधा घंटा उन्हें रिदमिक बना रहा है ऐसा महसूसा गया है जबकि माड़साब को डेढ़ महीना भर ही हुआ है बाक़ी माड़साब कहते हैं स्कूल में माइक खाली साल में दो बार ही बजता था झंडे से झंडे ये नए मास्टर की करामात है  उपर से पंकज और ये बड़का लड़का आतीश मीणा, एक दिन नहीं चुकते और अलार्म की तरह काम को अंजाम देते हैं  सरल वाक्य में पढ़े तो कुछ नया हुआ है और अच्छा भी 

नवाचार का तीसरा हिस्सा स्कूल की प्रार्थना में रोज़ होने वाला योग और प्राणायाम हैं ये स्कूल की नियमित गतिविधि थी नंदकिशोर दुबे जैसे बिरले पीटीआई होंगें जो इसे पूरी मुस्तैदी से कराते हैं बाक़ी बच्चे नाक पकड़ते और साँस उपर निचे करते रहते हैं। उनके काम में इन हिंदी वाले माड़साब का अड़ंगा पहले तो एक दख़ल की तरह लिया गया मगर आपसी संवाद के बाद इस योग और प्राणायाम के सात मिनटी शेड्यूल में मेडिटेशन के नाम पर सहायक 'तानपुरा' जोड़ा गया तानपुरे के अलग-अलग स्केल के कुछ ट्रेक्स कबाड़े गएप्रार्थना के दौरान मन को एकाग्र करने की ये कोशिश बच्चों सहित कुछेक अध्यापकों को भी जच गयी नवाचार आगे बढ़ता हुआ सफल होता दिखा जब बसेड़ा स्कूल मेडिटेशन की स्वरलहरियों से सराबोर हुआ तो माड़साब की आँखों में आँसू थे माड़साब खुद बच्चों के संग योग और प्राणायाम करने लगे बच्चों के लिए आठवां नहीं पहला आश्चर्य था गुरूजी के बीते पंद्रह साल के सभी अनुभव बच्चों के मानस पटल पर छपने लगे ध्यान की इन संगतों में गुरूजी को कभी पंडित रोनू मजुमदार जी की बांसुरी याद आयी तो कभी पंडित शिव कुमार शर्मा जी की संतूर वादन की प्रस्तुतियां माड़साब अपने आप में कुछ नहीं थे बस उनके अब तक के बहुधंधी होने का लाभ अब बसेड़ा के बच्चों को मिल रहा था, यही सच है बच्चों से फीडबेक अभी लिया नहीं मगर शर्तिया यह कारगर शाबित होगा इस तरह जुलाई 2017 का महीना वो महीना है जिस पर बसेड़ा के बच्चों के कान में तानपुरे के स्वर लिखे माने जाएंगे रास आने लगा और चस्का लगा तो अब मेडिटेशन में माड़साब तरह के वाद्ययन्त्र अपनाने लगे अब तक जयपुर के डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल जी से मिले ऑडियो खजाने की बदौलत बच्चों को सितार, संतूर, सरोद, मोहन वीणा, बांसुरी और शहनाई सुनने को मिली 'पीली लुगड़ी का', 'अमलीड़ो' और 'म्हारा इन्दर राजा' तक की ज़रूरी लोक धुनों की सिमित दुनिया वाले बच्चे अब शास्त्रीय संगीत के संसार से भी रू-ब-रू हो रहे थे ये करामात भी हिंदी वाले माड़साब की ही है माड़साब को बड़ी हाय लगेगी। बेचारे बच्चों का स्वाद असमय बदल रहे हैं। इस पूरे मुआमले की ख़ास बात ये है कि माड़साब इस कोंसेप्ट पर खुलासा या अवधारणा पर बात नहीं करते बस विविधता के साथ संगीत पेश करते रहते हैं स्कूल के कम्यूटर में पेन ड्राइव घुसेड़ते और निकालते रहते हैं  एक पेन ड्राइव चोरी हो गया तो दूजा खरीद लाए मगर रुके नहीं मतलब इसी नवाचार की ही ताकत थी कि बच्चे अजाने में ही उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, उस्ताद अमज़द अली खान साहेब, उस्ताद विलायत खान साहेब, पंडित हरी प्रसाद चौरसिया जी और पंडित विश्व मोहन भट्ट साहेब की बजायी राग रागनियों के ज़रिए उनकी विरासत से परिचित हो रहे थे संगीतमयी इस यात्रा में देहात के पिछड़े इलाके के एक स्कूल का ये अखिल भारतीय भ्रमण माना जाए 


नीरस प्रार्थना सभा अब रस देने वाली महसूसी गयी अच्छे और  गंभीर स्वभाव के संगीत की ऐसी मुलाकातें ही कहाँ रुकती? योजना के मुताबिक़ अब दोपहरी भोजन के दौरान स्कूल परिसर में शास्त्रीय गायन के ट्रेक्स अप्लाई किए गए  शुरू में बच्चे कान में अंगुलियाँ घुसेड़ने लगे मगर कहे किसे? माड़साब के आगे कौन जाए? अब धीरे-धीरे आदत हो गयी है आपको बसेड़ा की यह डायरी पढ़कर आश्चर्य होगा कि एक महीने में उन्होंने शुभा मुद्गल, डॉ. एम. बालमुरली कृष्णन, अश्विनी भिड़े देशपांडे, उस्ताद राशिद खान, पंडित वेंकटेश कुमार, पंडित भीमसेन जोशी, विदुषी गिरिजा देवी जी सहित कई नामचीन को सुना हैं क्लासिकल ट्रेक्स चुनने का सलीका माड़साब ने 'आकाशवाणी' और 'आरोहण' नामक म्यूजिकल ग्रुप में अपनी सेवाओं के दौरान सीखा  गायन प्ले करते समय ये संगीत उस दोपहर को संगीतमयी बेकग्राउंड म्यूजिक उपहार देता है बसेड़ा अब कोरा स्कूल नहीं बल्कि एक सुरीली जगह है जहां बच्चे अपने मन को फोकस करके अध्ययन की तरफ बढ़ रहे हैं। उनकी व्यवहार बदल रहा है। शांति का अर्थ समझने लगे हैं। ध्यान के पलों में चिड़ियाँ, मोर, हवा, गाय आदि की आवाज़ें अनुभव करने लगे हैं। स्कूल के नज्दिल के तालाब के पानी तक की आवाज़ सुन लेते हैं यह इस मेडिटेशन की ही ताकत है। अपने गुरुओं को ध्यान से एकटक देखते हैं और सुनते भी हैं। यह बड़ा परिवर्तन है। फिलहाल बसेड़ा से यही अच्छी खबर है बाकी अगली किश्त में। आप सभी को स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएं...। अंत में यह ख़बर कि इस प्रोजेक्ट जो भी अपने स्कूल में अपनाना चाहें बसेड़ा के हिंदी वाले माड़साब से मिल लें वे ज़रूर हेल्प करेंगे 

बसेड़ा की डायरी (15 अगस्त, 2017,लेखक:माणिक)

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