'बसेड़ा हिंदी क्लब' की 'सन्डे लाइब्रेरी'

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'टेंशन फ्री सेटरडे इन बसेड़ा'

'टेंशन फ्री सेटरडे इन बसेड़ा'

साल दो हज़ार से अध्यापक हूँ और लगातार नित नए प्रयोग का आदि हूँ। तेईस जून 2017 से अब तक में एक बारगी लगा बसेड़ा में अपनी झाँकी जम गयी है। काम चल निकला है और बच्चों के बीच मेरी पैठ भी जम गयी है। अपने काम के प्रयोग और अपनी धुन में मैं इधर-उधर कम ही देख पाता हूँ। मेरे साहेब अच्छे हैं और मेरे काम की तारीफ़ के साथ मुझे हौसला भी देते हैं अब और क्या चाहिए? खैर मैं सिर्फ विद्यार्थियों के संतोष के लिए काम करता रहा हूँ ऐसा कई बरसों से चला आ रहा है और उसमें मुझे पूरी तसल्ली है। बाकी आगा पीछा सोचना मेरी फितरत में नहीं। बीते डेढ़ माह में बसेड़ा हिंदी क्लब में दो बड़े आयोजन आकार ले पाए एक 'आरोहण' के साथी आसिफ़ भाई की देखरेख में बसेड़ा आए और यादगार आयोजन भेंट करके गए। उसी तरह 'रीडर्स कोर्नर' के साथी महेंद्र नंदकिशोर की अगुवाई में कुछ युवतर दोस्त आए और नुक्कड़ नाटक सहित एक अच्छा व्याख्यान दे गए। वे सभी शहरी थे मैंने उन्हें बसेड़ा जैसा देहाती फ्लेवर गिफ्ट किया और वे बेहद प्रसन्न थे। इस तरह हो गया शिक्षक दिवस। जितना सोचा उससे कई गुना अच्छा और यादगार। बच्चे प्रसन्न तो गुरु जी प्रसन्न।

आगे बढूँ तो जानो कि हिंदी दिवस मनाना हमारा दायित्व तो था ही नाक का सवाल भी था। चारेक दिन की तैयारी में ही बच्चों ने अठारह पोस्टर रंग दिए। कबीर से लेकर महादेवी तक और मीरा से लेकर दुष्यंत कुमार तक। बड़े प्रेम और मेहनत से रंगे पोस्टर आखिर में सभी को भा गए। आड़ी-टेड़ी रेखाओं के बीच से यह उनका पहला प्रयास अपने आप झाँक रहा था मगर हमारी खुशी यही थी कि वे अब कुछ कदम आगे बढे हुए खड़े थे। कई चुप्पे बच्चे अब बोलने लगे हैं। मेहनत का रंग अब नज़र आने लगा है। स्वरचित कविता पाठ और आशु भाषण से चेहरे खिल उठे। कोंपलें फूल बनने लगीं। प्रयोगों पर विश्वास बढ़ने की यही ऋतु है शायद। अब तक के गुमसुम बच्चे अब खुलने लगे हैं। सिलेबस और सिलेबस के बाहर के विषय पर बतियाने लगे हैं। पूछने और फेसबुक या वाट्स एप पर जुड़ने लगे हैं। हमारा क्लब का वाट्स एप ग्रुप भी हैं। हम बच्चों से हर उस मंच पर जुड़ना चाहते हैं जहां वे समय गुजारते हैं। अध्यापक और शिष्यों के बीच पल्लवन की यह बेला एक दिन बड़ा परिणाम देगी ऐसी हमारी इच्छा है।

ये थी स्कूली गतिविधि की कहानी जो सितम्बर के खाते लिखी गयी और अब विषय पर कुछ बात हो जाए। 'बसेड़ा में टेंशन फ्री सेटरडे'। यह विषय सिर्फ बसेड़ा के हिंदी वाले माड़साब का ईजाद किया हुआ है तो इसे सिर्फ हिंदी विषय के कक्षा ग्यारह और बारह विद्यार्थियों तक के सिमित परफोर्मे में समझा जाना चाहिए। मैं अलग टाइप का मास्टर हूँ। बच्चों से हर शनिवार कोर्स की किताबें स्कूल ले आने के लिए मना करता हूँ। कोर्स यानी सिलेबस से इतर पुस्तकें लाई और पढ़ी जाने की परम्परा को बढ़ा रहा हूँ। हमारा हिंदी क्लब कुछ किताबें एक महीने के लिए बच्चों को पढ़ने हेतु देता रहा है।वे पुस्तकें शनिवार को हिंदी के कालांश में पढ़ने की इजाज़त है। पुस्तकें पढ़ने के बाद कोई प्रश्न उत्तर नहीं और कोई परीक्षा नहीं। साप्ताहिक होमवर्क सिर्फ शनिवार को चेक होता बाकी दिन नहीं। मतलब बाकी दिन हिंदी की अभ्यास पुस्तिका स्कूल नहीं लानी पड़ती है। शनिवार को सिर्फ आराम और ऐसा पठन-पाठन जिसमें टेंशन न हो। किसी तरह के होमवर्क की टेंशन नदारद हो ऐसी कोशिश रहती है। सिर्फ हिंदी वाले माड़साब की यह सुविधा है बाकी विषय पर हमारा ज़ोर नहीं है और उनकी पक्की ख़बर हमारे पास है भी नहीं।

टेंशन फ्री सेटरडे के इसी दिन हमारी बारहवीं कक्षा में एक नेलकटर लटका मिलेगा जिसका उपयोग शनिवार के शनिवार करना होता है। हम इसी दिन बच्चों के बाल, नेल पोलिस, हाथों में अंगूठियाँ, पायजेब, गले की चेन आदि विभिन्न कलर के डोरे वगैरह-वगैरह नहीं पहनने की हिदायत के बाद उनकी चेकिंग करते हैं। बच्चे भले अठारह साल की उम्र पार गए हों मगर हमारी जिम्मेदारी तब ज्यादा बढ़ जाती है जब वे खासकर ग्रामीण इलाके से आते हैं और उनके सम्पूर्ण जीवन को अभिभावक हमारे भरोसे छोड़ जाते हैं। दो चोटी ही बनानी पड़ेगी इस बात को लेकर हम सख्त नहीं हैं जिसे जैसे बाल सुहाते और सुन्दर लगते हैं बनाएं, पूरी छूट है। हमारा मानना है कि स्कूल और पंचायती नोहरे में जाने के रोल अलग-अलग हैं। पढ़ना और जीमने जाना अलग-अलग विधा हैं। स्कूल आओ तो स्कूल के लिहाज से स्टूडेंट फॉर्म में आओ। खैर इसी टेंशन लेस सेटरडे को हम अक्सर बच्चों से उनके मेमोरी कार्ड मंगवाते हैं उन्हें कम्यूटर से ऑडियो विजुअल रचनाएं और सन्दर्भ सामग्री लोड करके देते हैं। ऐसे माड़साब नहीं देखें होंगे ना? इसी दिन बच्चे मुझसे फ़िल्में लेकर जाते हैं और सन्डे को टीवी या मोबाइल पर देखते हैं। अब तो कई निर्गुणी भजन और कबीर केन्द्रित फ़िल्में बच्चों के बीच भ्रमण कर रही हैं। 'हिंदी मीडियम' और 'पूर्णा' जैसी फ़िल्में उनकी पसंद में शामिल हो चुकी हैं। अब समझ जाना कि इन फिल्मों में शाहरुख खान या विद्या बालन तो मिलेगी नहीं। हमारे आर्काइव में जितनी फ़िल्में हैं सब ऐसी फ़िल्में हैं जो हमें मुख्यधारा से जुदा किस्म की लगती है। खासकर डॉक्युमेंट्री या ज़रूरी मुद्दों पर आधारित फीचर फ़िल्में।

स्कूल में एक पुराना ऑडियो सिस्टम हैं जिसे हम धका रहे हैं। पता नहीं नया कब आएगा? आर्थिक संसाधन इतने है नहीं, मगर काम चल रहा है। इस सिस्टम में दिक्कत यह है कि सिर्फ mp3 वर्जन के ट्रेक ही प्ले होते हैं। ट्रेक के चुनाव में समस्या है मगर देखते हैं समस्या कब तक साथ देती है। हम हार मानने वाले हैं नहीं। बीते छह दिन में पढ़ाए गए पाठों से मिलते जुलते ऑडियो ट्रेक, ऑडियो वार्ताएं, ऑडियो कहानियां आदि कहीं से भी कबाड़ कर लाते और बच्चों के लिए उनकी कक्षा में ही जाकर शनिवार को क्यू कर देते। बच्चे हिंदी के पीरियड का इंतज़ार करते होंगे ऐसा हमारा भ्रम है। अरे हाँ अब तो बच्चे सिस्टम को खुद ही ओपरेट करने लगे हैं। मैं कई रेडियो रूपक, रेडियो वार्ताएं बीते दशक में लगातार सुनता रहा हूँ उनका एक बड़ा खज़ाना अब काम आ रहा है। बच्चे शनिवार को लेकर उत्साहित रहते हैं। याद आया कि इसी टेंशन फ्री सेटरडे में चयनित और रुचिशील बच्चों को फोटोग्राफी भी सिखाई है। कम्यूटर और फोटोकॉपी मशीन हेंडल करना सिखाया है। इसी सेटरडे में बच्चों में सेन्स ऑफ़ वोलंटियरशिप का विकास किया है। इसी सेटरडे में बच्चों को ट्यूबलाइट लगाने और उनके कनेक्शन करना सिखाया है। इसी तरह के किसी सेटरडे में हमने बाल पत्रिकाओं का एक आर्काइव बनाकर प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के बीच पढ़ने-लिखने का माहौल बनाना शुरू किया है।

हमारे हिंदी क्लब के बच्चों में टेंशन फ्री सेटरडे का कोंसेप्ट अब गहरे में बैठ गया है। जीवन में लगातार अंक, ग्रेड, परीक्षा और मेरिट के मक्कड़जाल से बच्चा कभी वैसे ही बाहर नहीं आ पाता है इसलिए इस तरह से कोंसेप्ट उन्हें टेंशन-लेस मॉड में ला जाते हैं ऐसी हमारी धारणा है। एक्जाम टॉप करने के तनाव में कोचिंग सेंटर और कोटा में लगातार होती आत्महत्याओं की कहानियां दिल दहला जाती है। तनाव से दूर करने का यह एक दिन उन सभी बच्चों के लिए इन गतिविधियों से नार्मल करने का एक बड़ा गंभीर तरिका है। हम उन विधाओं पर काम कर रहे हैं जिन्हें हमारे समाज में अक्सर गैर ज़रूरी समझा जाता है। फ़िल्में और गीत-संगीत भी जीवन में कुछ न कुछ जोड़ते ही हैं यह धारणा इसी प्रयोग का आधार है। हम उन्हीं सभी गैर ज़रूरी बिन्दुओं पर फोकस कर रहे हैं। बच्चों को यह सेटरडे एकदम फ्रेश कर देता है और वो सन्डे के भरपूर आनंद के बाद जब मंडे को स्कूल आते हैं तो एक उत्साह और स्फूर्ती के साथ आते हैं।

शुक्रवार को आराम की नींद लेने वाले बच्चे टेंशन फ्री सेटरडे के सपने देखते हैं। वे सिलेबस से ज्यादा सेटरडे को सुनी और पढ़ी साहित्येतर रचनाएं पसंद करने लगे हैं। भले उनकी समझ अभी बहुत सतही है मगर उनका रुझान एक बेहतर पाठक बनने की तरफ ही है। इतना काफी है इस उम्र में। बीते कुछ समय से हमारे पास जुगाड़ का एक पोर्टेबल प्रोजेक्टर हाथ लगा है तो अब हम कक्षा में ही कुछ फीचर और डॉक्युमेंट्री स्क्रीन करेंगे ऐसी योजना है। हालाँकि इस काम में बहुत सारी एनर्जी लग जाती है और जुम्मे की रात से ही माड़साब को भी पूरी प्लानिंग करनी होती है कि कौनसी कक्षा में कब कौनसा ट्रेक लेकर जाना है? एक दिन हम कामयाब होंगे यही सोचकर तमाम मेहनत जारी है। लोग भले देखें या न देखें, बच्चे सब समझते हैं। इसी बीच एक दिन अचानक लिए आशु फीडबेक में हमें अपार खुशी हुई कि बच्चों का मन लग रहा है और वे इन सभी नवाचारों का उनके खुद पर असर देख-अनुभव कर रहे हैं।

(बसेड़ा की डायरी 18 सितम्बर,2017)

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